मुद्दे का राजनीतिकरण से गिरा महिला आरक्षण बिल:अनुराधा त्रिवेदी
वरिष्ठ पत्रकार भोपाल
अंततः देश की सबसे पुरानी पार्टी और तमाम विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल पारित नहीं होने दिया। एक पार्टी जिसकी सर्वेसर्वा महिला है, उस पार्टी के दूसरे क्रम में सर्वोच्च भी महिला है। साथ ही बंगाल में भी सर्वोच्च एक महिला है। उत्तर प्रदेश की विपक्षी पार्टी में भी द्वितीय क्रम में भी महिला सर्वोच्च है। इन तमाम महिला प्रमुखों के होते हुए भी महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े बिल- "संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026" पर वोटिंग से पहले महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल पर लंबी बहस चली। विपक्ष की ओर से इन बिलों का लगातार विरोध किया गया। बिल का गिरना देश की आधी आबादी की हार है, उनके कारण जिन्होंने संसद में बैठ कर अपनी अहम की वजह से महिलाओं का साथ छोड़ दिया। बिल को लेकर सरकार को विपक्ष ने साथ नहीं दिया और अब सरकार ने विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सामाजिक दृष्टि से देखें, "तो नारी न सोहे नारी के रूपा" पर इसका बड़ा सीधा विकल्प है। जो पार्टियां आरक्षण के पक्ष में हैं, वो महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करके अपनी पार्टी की महिलाओं को 33 प्रतिशत सीट दे दें। हम आज भी उन पुरुषों की दया और समर्थन के मोहताज हैं, जिनको इस धरती पर जन्म लेने के लिए हमारी जरूरत है। सोचो यदि स्त्रियां नर भ्रूण को जन्म देने से मना कर दे, तो ये धरती कैसी हो जाएगी ? पुरुष विहीन। मुझे लगता है, महिलाओं को समाज के लिए अपना सर्वोच्च योगदान देना चाहिए। समाज के लिए सेवा का ऐसा उदाहरण पेश करना चाहिए, कि सारी पार्टियां उसे अपना प्रत्याशी बनाकर खुद को धन्य समझे।
आरक्षण ने देश को वैसे भी बर्बाद कर रखा है, उस पर प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में योग्यता, कर्मठता समाज के हित में है। शिक्षा और स्वास्थ्य समाज की आखिरी पंक्ति में खड़ी उन दीन-हीन महिलाओं कोसमाज में सशक्त प्रदर्शन करना होगा। ऐसा प्रदर्शन, कि आप (महिलाओं) की लोगों को जरूरत बन जाए, तब यही सब पार्टियां आपके पीछे हाथ जोड़कर घूमेंगी। महिला आरक्षण बिल पारित नहीं होने का कारण "मुद्दे का राजनीतिकरण" होना है। इसमें वोट का गणित विपक्ष लगा रहा है। सत्ता पक्ष तो बिल पारित न होने पर भी महिलाओं को ये संदेश देने में सफल भी हो जाएगा, कि हम तो आपको समाज में अग्रिम पंक्ति में ला रहे थे, विपक्ष ने लाने ने नहीं दिया।
अब बिल आने के बाद की स्थितियों पर भी विचार करें। क्या होता जब आरक्षण लागू हो जाता ! क्या तब भी महिलाओं की राह आसान होती, बिल्कुल नहीं। जो पुरुष पूरे जोश से बरसी, इस उम्मीद से पार्टियों की सेवा कर रहे हैं, तो कभी विधायक का टिकट मिलेगा, जब उसकी सीट पर महिला प्रत्याशी होगी। तो क्या उसकी जीत आसान होती ? जो विधायक बनने की ख्वाहिश पाले बैठे है, वो क्या महिला को जीतने देते ? मुझे हमेशा लगता है, आरक्षण में योग्यता और पब्लिक में रेपुटेशन, एजुकेशन और समाज को नेतृत्व के गुण के आधार पर महिलाओं को आगे लाया जाना चाहिए। मुझे अच्छे से मालूम है, कि बिल पारित न होने का एकमात्र कारण है, सत्ता पक्ष को बिल का लाभ न मिले। हालांकि, ये भी तय है कि बिल पारित न होने के कारणों का प्रोपेगेंडा भी सत्ता पक्ष को फायदा ही पहुंचाएगा। महिलाएं बिल्कुल निराश न हों। सितारों के आगे जहां और भी है।
मात्र 54 वोटों से महिला आरक्षण बिल गिर गया। 24 घंटे से ज्यादा चली बहस बेनतीजा रही। भाजपा जहां इस बिल को नारी सशक्तिकरण के लिए महत्वपूर्ण मान रही है। वहीं, कांग्रेस ने इसे संविधान तोड़ने के लिए असंवैधानिक तरीका बताया। बिल पेश करते वक्त सदन में 528 सांसद मौजूद थे। बिल के पक्ष में वोट पड़े 298, विपक्ष में 230 वोट। बिल पारित होने के लिए जरूरी 352 वोट होने थे। बिल 54 वोट की कमी से पारित नहीं हो पाया। बिल पर नेता प्रतिपक्ष बहस के दौरान प्रधानमंत्री पर बेहद अपमानजनक टिप्पणी करते दिखे, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही से अलग करने का निर्देश दिया। सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस को 17 अप्रैल का इतिहास याद दिलाया, जब स्वर्गीय राजीव गांधी पर बोफोर्स के आरोप लगे थे, जब 17 अप्रैल 1999 को कांग्रेस ने बीजेपी की सरकार गिरा दी, जब ओबीसी नेता कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उनको बाथरूम में बंद करके सोनिया गांधी की मौजूदगी में दुर्व्यवहार किया था।
क्या वाकई दक्षिण भारत की सीटें कम हो जाती ?
विपक्ष ने आरोप लगाया, कि नए कानून से दक्षिण भारत में सीटों की संख्या कम और उत्तर भारत में सीटें बढ़ जाएंगी। इससे उत्तर भारत वर्सेस दक्षिण भारत की लड़ाई शुरू हो जाएगी और यह दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ नाइंसाफी है, क्योंकि उनका महत्व कम हो जाएगा। वास्तव में यह आरोप बिल्कुल झूठ है और केवल विपक्ष का अफवाह है। सरकार का कहना है, उत्तर और दक्षिण भारत की हिस्सेदारी में लोकसभा में कोई बदलाव नहीं होगा। यह आंकड़ों से समझें। अभी दक्षिण भारत के पांच राज्य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में कुल मिलाकर 129 लोकसभा सीटें हैं, जो 543 सीटों वाली लोकसभा में 23.75% बनता है। यानी कुल मिलाकर दक्षिण भारत का जो प्रतिनिधित्व है, आज लोकसभा में 23.75% है। जब यह लोकसभा में 816 सांसद हो जाएंगे, तब दक्षिण भारत के पांच राज्यों के 195 सांसद होंगे, क्योंकि उसी अनुपात में इनकी सीटें बढ़ेंगी और तब भी दक्षिण भारत के इन पांच राज्यों की 23.89% हिस्सेदारी लोकसभा में होगी।
महिला सांसदों द्वारा विपक्ष के खिलाफ मकर द्वार पर तगड़ा विरोध किया गया। लब्बोलुआब ये कि महिलाओं के हित का बिल विपक्ष की राजनीति की भेंट चढ़ गया। जो मुद्दे उठाए गए, वो बिल से इतर के थे। सार्थक बहस के बजाय हंगामा, आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गया महिला आरक्षण बिल। चलिए अभी आगे बहुत कुछ बाकी देखना है, पर ये तो पक्का है-
दुनिया की छत को थामे हुए जिन कंधों पे
इस पार आदमी है, उस पार है औरत,
देने तो पड़ेंगे, दे क्यों नहीं देते,
तमाम वो हक़, जिसकी हकदार है औरत,
नींव है बुनियाद, है मीनार है औरत,
दुनिया को संभाले, किरदार है औरत।

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