छोटी रकम, बड़ी सजा; हाई कोर्ट ने 25 साल बाद दिया न्याय
जबलपुर। हाई कोर्ट ने एक 25 साल पुराने मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. रेलवे में नौकरी करते समय एक बुकिंग क्लर्क को यात्री से 10 रुपये अधिक लेने के आरोप में विजिलेंस ने पकड़कर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की है. बुकिंग क्लर्क ने टीम को बताया भी है कि वहा बेकसूर है, उसने टीम के सामने बहुत प्रयास भी किए खुद को निर्दोष साबित करने के लिए, लेकिन उनके प्रयास सफल नहीं हो पाए. क्लर्क बार-बार कहता रहा कि जिस समय यात्री काउंटर में टिकट लेने के लिए आया था, उस समय बहुत ज्यादा भीड़ थी, हो सकता है भूल हो गई हो. उसके सब कुछ बताने के बाद भी बिना सुनवाई के उसके खिलाफ कार्रवाई की गई और रेलवे ने उन्हें बर्खास्त कर दिया।
25 साल बाद मिला न्याय
दरअसल, मामला जनवरी 2001 का है. मामले में बुकिंग क्लर्क नारायण नायर ने अपने खिलाफ हाेने वाली कार्रवाई को लेकर सबसे पहले केंद्रीय प्रशासनिक प्रधिकरण (केट) और बाद में जबलपुर हाई कोर्ट में बड़ी लड़ाई लड़ी और आखिरकार 25 सालों के लंबे इंतजार के बाद शनिवार को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उनके पक्ष में अपना फैसला सुनाते हुए विजिलेंस की कार्रवाई को गलत साबित किया है. पूरे मामले पर हाई कोर्ट ने सख्त रूख अपनाते हुए टिप्पणी की है कि विजिलेंस विभाग की पूरी कार्रवाई अवैध और नियमों के खिलाफ है. जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच के इस फैसले के बाद 25 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे नारायण नायर की बहाली का रास्ता साफ कर दिया है।
क्लर्क ने 31 रुपये की जगह लौटाए थे 21 रुपये
मामला में 4 जनवरी 2002 को रेलवे में पदस्थ बुकिंग क्लर्क नारायण की ड्यूटी श्रीधाम स्टेशन पर टिकट काउंटर पर लगी थी. इस दौरान वहां विजिलेंस की टीम पहुंच गई. जांच के समय एक व्यक्ति सामने आया और बोला की नारायण नायर ने उसे 31 रुपये वापस लौटाने के बजाय 21 रुपये ही लौटाए हैं. इस पूरे मामले में विजिलेंस की टीम का कहना था कि नारायण नायर के पास 450 रुपये अतिरिक्त रखे थे, जिस पर नारायण नायर का कहना था कि वे पैसे उनके पास पत्नी की दवा लेकर आने के लिए रखे थे. विजिलेंस की टीम को मौके पर से टिकट का बंडल भी मिला था, जिसको लेकर कहा गया था कि वो जमीन पर पड़ा था, जिसकी उनको जानकारी नहीं थी. इसके अलावा 778 रुपये अतिरिक्त थे, जो बाद में केवल 7 रुपये ही पाए गए थे।
पहले किया सस्पेंड और फिर बर्खास्त
विजिलेंस की टीम ने नारायण नायर को चार केस तहत कार्रवाई करते हुए उनके खिलाफ जांच शुरू की और फिर नारायण नायर को दोषी करार देते हुए पहले निलंबित किया, उसके बाद 15 मार्च 2002 को सेवा से बर्खास्त कर दिया. बर्खास्त होने के बाद नारायण नायर ने विजिलेंस की कार्रवाई के खिलाफ वरिष्ठ अधिकारी सहायक मंडल रेलवे प्रबंधक के सामने अपील की, उन्होंने कहा कि किसी प्रकार का आरोप सिद्ध नहीं हुआ, इसके बाद भी उन्हें वहां से राहत नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने 2002 में केंद्रीय प्रशासनिक प्रधिकरण (CAT) में केस दायर किया।
विजिलेंस की जांच में मिली खामियां
केंद्रीय प्रशासनिक प्रधिकरण (CAT) ने मामले पर सुनवाई करते हुए 16 जुलाई 2004 को नारायण नायर को राहत देते हुए उनकी सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया. केट के आदेश को रेलवे ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए 2005 में अपील दायर कर दी. हाई कोर्ट में सुनवाई के समय क्लर्क नारायण नायर की ओर से अधिवक्ता अकाश चौधरी ने दलीलें रखी. इस केस में लगातार कई सालों तक सुनवाई हुई और केस में आखिरकार अप्रैल 2026 में फैसला आया, जिसमें जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद विजिलेंस की जांच में गंभी खामियां बताई।
हाई कोर्ट ने (CAT) के फैसले को सही ठहराया
कोर्ट ने मामले में कहा कि अधिकारी ने जांच के दौरान अभियोजन की भूमिका निभाने को गलत बताया और याचिकाकर्ता को अपने पक्ष में बोलने का पूरा मौका नहीं दिया, जो अवैध माना गया है. बुकिंग क्लर्क नारायण नायर की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने (CAT) के फैसले को सही ठहराते हुए रेलवे की अपील को खारिज कर दिया. कोर्ट के इस फैसले के बाद क्लर्क नारायण नायर की बहाली का रास्ता भी साफ हो गया है और उन्हें पिछले 25 सालों के अन्य लाभ भी मिल सकते हैं।

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